भारत के घोटालों
की सूची (वर्ष के अनुसार), Also
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आजादी से अब तक
देश में काफी बड़े घोटालों का इतिहास रहा है। नीचे भारत में हुए बड़े घोटालों का
संक्षिप्त विवरण दिया गया है-
1.जीप खरीदी (१९४८)
आजादी के बाद
भारत सरकार ने एक लंदन की कंपनी से २००० जीपों को सौदा किया। सौदा ८० लाख रुपये का
था। लेकिन केवल १५५ जीप ही मिल पाई। घोटाले में ब्रिटेन में मौजूद तत्कालीन भारतीय
उच्चायुक्त वी.के. कृष्ण मेनन का हाथ होने की बात सामने आई। लेकिन १९५५ में केस
बंद कर दिया गया। जल्द ही मेनन नेहरु केबिनेट में शामिल हो गए।
2.साइकिल आयात (१९५१)
तत्कालीन वाणिज्य
एवं उद्योग मंत्रालय के सेकरेटरी एस.ए. वेंकटरमन ने एक कंपनी को साइकिल आयात कोटा
दिए जाने के बदले में रिश्वत ली। इसके लिए उन्हें जेल जाना पड़ा।
3.मुंध्रा मैस (१९५८)p
हरिदास मुंध्रा
द्वारा स्थापित छह कंपनियों में लाइफ इंश्योरेंस कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया के १.२ करोड़
रुपये से संबंधित मामला उजागर हुआ। इसमें तत्कालीन वित्त मंत्री टीटी कृष्णामचारी, वित्त सचिव एच.एम.पटेल, एलआईसी चेयरमैन एल एस वैद्ययानाथन का नाम आया। कृष्णामचारी
को इस्तीफा देना पड़ा और मुंध्रा को जेल जाना पड़ा।p
4.तेजा ऋण
१९६० में एक
बिजनेसमैन धर्म तेजा ने एक शिपिंग कंपनी शुरू करने केलिए सरकार से २२ करोड़ रुपये
का लोन लिया। लेकिन बाद में धनराशि को देश से बाहर भेज दिया। उन्हें यूरोप में
गिरफ्तार किया गया और छह साल की कैद हुई।
5.पटनायक मामला
१९६५ में उड़ीसा
के मुख्यमंत्री बीजू पटनायक को इस्तीफा देने केलिए मजबूर किया गया। उन पर अपनी
निजी स्वामित्व कंपनी 'कलिंग ट्यूब्सÓ को एक सरकारी कांट्रेक्ट दिलाने केलिए मदद करने का आरोप था।
6.मारुति घोटाला
मारुति कंपनी
बनने से पहले यहां एक घोटाला हुआ जिसमें पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का नाम
आया। मामले में पेसेंजर कार बनाने का लाइसेंस देने के लिए संजय गांधी की मदद की गई
थी।
7.कुओ ऑयल डील
१९७६ में तेल के
गिरते दामों के मददेनजर इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन ने हांग कांग की एक फर्जी कंपनी से
ऑयल डील की। इसमें भारत सरकार को १३ करोड़ का चूना लगा। माना गया इस घपले में
इंदिरा और संजय गांधी का भी हाथ है।
8.अंतुले ट्रस्ट
१९८१ में
महाराष्ट्र में सीमेंट घोटाला हुआ। तत्कालीन महाराष्ट्र मुख्यमंत्री एआर अंतुले पर
आरोप लगा कि वह लोगों के कल्याण के लिए प्रयोग किए जाने वाला सीमेंट, प्राइवेट बिल्डर्स को दे रहे हैं।
9.एचडीडब्लू दलाली (१९८७)
जर्मनी की
पनडुब्बी निर्मित करने वाले कंपनी एचडीडब्लू को काली सूची में डाल दिया गया। मामला
था कि उसने २० करोड़ रुपये बैतोर कमिशन दिए हैं। २००५ में केस बंद कर दिया गया।
फैसला एचडीडब्लू के पक्ष में रहा।
10.बोफोर्स घोटाला
१९८७ में एक
स्वीडन की कंपनी बोफोर्स एबी से रिश्वत लेने के मामले में राजीव गांधी समेत कई
बेड़ नेता फंसे। मामला था कि भारतीय १५५ मिमी. के फील्ड हॉवीत्जर के बोली में
नेताओं ने करीब ६४ करोड़ रुपये का घपला किया है।
11.सिक्योरिटी स्कैम (हर्षद
मेहता कांड)
१९९२ में हर्षद
मेहता ने धोखाधाड़ी से बैंको का पैसा स्टॉक मार्केट में निवेश कर दिया, जिससे स्टॉक मार्केट को करीब ५००० करोड़ रुपये का घाटा हुआ।
12.इंडियन बैंक
१९९२ में बैंक से
छोटे कॉरपोरेट और एक्सपोटर्स ने बैंक से करीब १३००० करोड़ रुपये उधार लिए। ये
धनराशि उन्होंने कभी नहीं लौटाई। उस वक्त बैंक के चेयरमैन एम. गोपालाकृष्णन थे।
13.चारा घोटाला
१९९६ में बिहार
के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव और अन्य नेताओं ने राज्य के पशु पालन
विभाग को लेकर धोखाबाजी से लिए गए ९५० करोड़ रुपये कथित रूप से निगल लिए।
14.तहलका
इस ऑनलाइन न्यूज
पॉर्टल ने स्टिंग ऑपरेशन के जारिए ऑर्मी ऑफिसर और राजनेताओं को रिश्वत लेते हुए
पकड़ा। यह बात सामने आई कि सरकार द्वारा की गई १५ डिफेंस डील में काफी घपलेबाजी
हुई है और इजराइल से की जाने वाली बारक मिसाइल डीलभी इसमें से एक है।
15.स्टॉक मार्केट
स्टॉक ब्रोकर
केतन पारीख ने स्टॉक मार्केट में १,१५,००० करोड़ रुपये का घोटाला किया। दिसंबर, २००२ में इन्हें गिरफ्तार किया गया।
16.स्टांप पेपर स्कैम
यह करोड़ो रुपये
के फर्जी स्टांप पेपर का घोटाला था। इस रैकट को चलाने वाला मास्टरमाइंड अब्दुल
करीम तेलगी था।
17.सत्यम घोटाला
२००८ में देश की
चौथी बड़ी सॉफ्टवेयर कंपनी सत्यम कंप्यूटर्स के संस्थापक अध्यक्ष रामलिंगा राजू
द्वारा ८००० करोड़ रूपये का घोटाले का मामला सामने आया। राजू ने माना कि पिछले सात
वर्षों से उसने कंपनी के खातों में हेरा फेरी की।
18.मनी लांडरिंग
२००९ में मधु
कोड़ा को चार हजार करोड़ रुपये की मनी लांडरिंग का दोषी पाया गया। मधु कोड़ा की इस
संपत्ति में हॉटल्स, तीन कंपनियां, कलकत्ता में प्रॉपर्टी, थाइलैंड में एक हॉटल और लाइबेरिया ने कोयले की खान शामिल
थी।
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19.बोफर्स घोटाला- ६४ करोड़
रु.
मामला दर्ज हुआ -
२२ जनवरी, १९९०
सजा - किसी को
नहीं
वसूली - शून्य
20.एच.डी. डब्ल्यू सबमरीन-
३२ करोड़ रु.
मामला दर्ज हुआ -
५ मार्च, १९९०
(सीबीआई ने अब मामला बंद
करने की अनुमति मांगी है।)
सजा - किसी को
नहीं
वसूली - शून्य
(१९८१ में जर्मनी से ४
सबमरीन खरीदने के ४६५ करोड़ रु. इस मामले में १९८७ तक सिर्फ २ सबमरीन आयीं, रक्षा सौदे से जुड़े लोगों द्वारा लगभग ३२ करोड़ रु. की
कमीशनखोरी की बात स्पष्ट हुई।)
21.स्टाक मार्केट घोटाला-
४१०० करोड़ रु.
मामला दर्ज हुआ -
१९९२ से १९९७ के बीच ७२
सजा - हर्षद
मेहता (सजा के १ साल बाद मौत) सहित कुल ४ को
वसूली - शून्य
(हर्षद मेहता द्वारा किए
गए इस घोटाले में लुटे बैंकों और निवेशकों की भरपाई करने के लिए सरकार ने ६६२५
करोड़ रुपए दिए, जिसका बोझ भी करदाताओं पर
पड़ा।)
22.एयरबस घोटाला- १२० करोड़
रु.
मामला दर्ज हुआ -
३ मार्च, १९९०
सजा - अब तक किसी
को नहीं
वसूली - शून्य
(फ्रांस से बोइंग ७५७ की
खरीद का सौदा अभी भी अधर में, पैसा वापस नहीं आया)
23.चारा घोटाला- ९५० करोड़
रुपए
मामला दर्ज हुआ -
१९९६ से अब तक कुल ६४
सजा - सिर्फ एक
सरकारी कर्मचारी को
वसूली - शून्य
(इस मामले में बिहार के
पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव हालांकि ६ बार जेल जा चुके हैं)
24.दूरसंचार घोटाला-१२००
करोड़ रुपए
मामला दर्ज हुआ -
१९९६
सजा - एक को, वह भी उच्च न्यायालय में अपील के कारण लंबित
वसूली - ५.३६
करोड़ रुपए
(तत्कालीन दूरसंचार मंत्री
सुखराम द्वारा किए गए इस घोटाले में छापे के दौरान उनके पास से ५.३६ करोड़ रुपए नगद
मिले थे, जो जब्त हैं। पर
गाजियाबाद में घर (१.२ करोड़ रु.), आभूषण (लगभग १० करोड़
रुपए) बैंकों में जमा (५ लाख रु.) शिमला और मण्डी में घर सहित सब कुछ वैसा का वैसा
ही रहा। सूत्रों के अनुसार सुखराम के पास उनके ज्ञात स्रोतों से ६०० गुना अधिक
सम्पत्ति मिली थी।)
25.यूरिया घोटाला- १३३ करोड़
रुपए
मामला दर्ज हुआ -
२६ मई, १९९६
सजा - अब तक किसी
को नहीं
वसूली - शून्य
(प्रधानमंत्री नरसिंहराव
के करीबी नेशनल फर्टीलाइजर के प्रबंध निदेशक सी.एस.रामाकृष्णन ने यूरिया आयात के
लिए पैसे दिए, जो कभी नहीं आया।)
26.सी.आर.बी- १०३० करोड़
रुपए
मामला दर्ज हुआ -
२० मई, १९९७
सजा - किसी को
नहीं
वसूली - शून्य
(चैन रूप भंसाली (सीआरबी)
ने १ लाख निवेशकों का लगभग १ हजार ३० करोड़ रु. डुबाया और अब वह न्यायालय में अपील
कर स्वयं अपनी पुर्नस्थापना के लिए सरकार से ही पैकेज मांग रहा है।)
27.केपी- ३२०० करोड़ रुपए
मामला दर्ज हुआ -
२००१ में ३ मामले
सजा - अब तक नहीं
वसूली - शून्य
(हर्षद मेहता की तरह केतन
पारेख ने बैंकों और स्टाक मार्केट के जरिए निवेशकों को चूना लगाया।)
2जी स्पेक्ट्रम घोटाले का
पर्दाफाश
कैग का एक और
सनसनीखेज खुलासा। 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले का
पर्दाफाश करने के करीब 16 महीने बाद नियंत्रक एवं
महालेखापरीक्षक (कैग) ने इसी तरह के एक और घोटाले से पर्दा उठाया है। कैग की
रिपोर्ट के मुताबिक, कोयला खदानों में हुए
बंदरबांट से सरकारी खजाने को 10.67 लाख करोड़ रुपये का चूना
लगा है। यह रकम 2जी घोटाले की रकम 1.76 लाख करोड़ से 6 गुना ज्यादा है।
कैग की रिपोर्ट
पर जब टाइम्स नाउ ने कोयला मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल से प्रतिक्रिया मांगी,तो उन्होंने कहा कि हवा में आई किसी रिपोर्ट पर वह जवाब
नहीं दे सकते हैं। उन्होंने कहा कि मंत्रालय ने कैग से संपर्क साधा है और अगर ऐसी
कोई रिपोर्ट है तो शाम तक उन्हें मिल जाएगी। इसके बाद ही इस पर कोई प्रतिक्रिया दी
जाएगी। प्रधानमंत्री कार्यालय और कानून मंत्री सलमान खुर्शीद ने भी कुछ भी टिप्पणी
से इनकार कर दिया है।
कैग की रिपोर्ट
के मुताबिक, 2004 से 2009 के दौरान कंपनियों को 155 कोयला ब्लॉकों का आवंटन बिना नीलामी के ही कर दिया गया।
इससे कंपनियों को कई लाख करोड़ रुपये का फायदा हुआ है। कोयला खदानों के आवंटन से
जिन कमर्शल इकाइयों को फायदा पहुंचा उनमें पावर, स्टील और सीमेंट इंडस्ट्री की करीब 100 प्राइवेट कंपनियां हैं और बाकी सरकारी कंपनियां।
कोयला घोटालl
"भारत निर्माण" में
महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला प्राकृतिक संसाधन, कोयला भी जब घोटाले का शिकार बन जाए तो देश में "और
क्या क्या हो सकता है - सोचिये ज़रा" | यदि आप हिन्दू
नववर्ष के उत्सव की तैयारियाँ कर रहे थे तो शायद नव-वर्ष का रंग थोडा उतर जाए -
कारण यूपीए सरकार के एक और 'नीतिगत निर्णय' के कारण सीऐजी के अनुसार देश को १०६७०००००००००० रुपये का नुक्सान हुआ है यानी
हर भारतीय के हिस्से में आया लगभग ९००० का घाटा | यदि आपके परिवार में ६ सदस्य हैं, तो घाटे में आपके परिवार का हिस्सा हुआ लगभग ५४००० रुपये |
कहावत है कि
कोयले की दलाली में मुंह काला होता है,
और यहाँ पहले ही
घोटालों की कालिख पोते बैठी केंद्र की कांग्रेस-नेतृत्व वाली यूपीए सरकार अब एक और
बार मुख मलिन करवा चुकी है | सीएजी की रिपोर्ट जिसका
सम्बंधित समाचार अंग्रेजी दैनिक टाईम्स ऑफ़ इंडिया ने छापा है, और कहती है कि कोयले जैसे प्राकृतिक संसाधन को नीलाम न करवा
कर और उसे ऐसे ही निजी एवं सार्वजानिक क्षेत्र की कंपनियों को सस्ते दामों पर दे
देने से देश को इतना बड़ा नुक्सान हुआ है | ये हानि २००४ से
२००९ के बीच बेचे गए कोयले के ब्लॉकों से हुयी है | लाभ उठाने वालों में लगभग १०० निजी उपक्रम हैं | १०.६७ लाख करोड़ की ये राशि २ जी घोटाले की राशि की ६ गुनी
है और यह अनुमान सस्ते कोयले पर लगाया गया है न कि माध्यम दर्जे के कोयले पर, यानी माध्यम कीमतों पर अनुमान लगायें तो ये राशि और अधिक
होगी | यह राशि भारत के जीडीपी के १२ प्रतिशत से भी
अधिक है |
पत्र में प्रकशित
समाचार के अनुसार सीएजी ने अपनी ११० पृष्ठों की रिपोर्ट में कोयला मंत्रालय के
विचारों को भी रखा है और उनका उत्तर दिया है | रिपोर्ट को बजट पारित होने के बाद सदन में रखने की संभावना
है और इस हंगामा होना अपेक्षित हैं |
इस घोटाले में ३३
अरब टन कोयला शामिल है जो वर्तमान उत्पादन क्षमता के अनुसार ५० साल तक देश के लिए
बिजली पैदा करने के लिए काफी होता |
रिपोर्ट के
अनुसार निजी क्षेत्र के उपक्रमों को लगभग ४.७९ लाख करोड़ का लाभ हुआ है और ५.८८
लाख सार्वजानिक क्षेत्र के उपक्रमों को गया है, परन्तु यह भी सच है कि सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम भी
कोयला खनन का काम अक्सर निजी क्षेत्र को ही देते हैं | लाभान्वितों में टाटा
ग्रुप, जिंदल स्टील एंड पावर, इलेक्ट्रो स्टील,
अनिल अग्रवाल
ग्रुप, भूषण पावर एंड स्टील, जायसवाल नेको,
अभिजीत ग्रुप, आदित्य बिड़ला ग्रुप, एस्सार ग्रुप, अदानी ग्रुप, आर्सेलर मित्तल, लैंसो ग्रुप आदि शामिल हैं | जिंदल ग्रुप के नवीन
जिंदल ने कहा के सीएजी की रिपोर्ट जो भी हो उन्हें गर्व है कि वो भारत को धनवान
बना रहे हैं |
कोयला मंत्रालय
का कहना था कि ऊर्जा क्षेत्र में कोयले को वास्तविक मूल्यों पर बेचा जाता है | इसके उत्तर में सीएजी ने कहा है कि कोयला प्राकृतिक संसाधन
है और उसके विक्रय नीलामी कर के प्रतिस्पर्धी मूल्यों पर होना चाहिए | सीएजी ने सर्वोच्च न्यायालय के २ जी घोटाले के सन्दर्भ में
दिए गए निर्णय का भी नाम लिया है जो कहता
है कि सरकार को राष्ट्रीय सम्पदा का संरक्षक एवं न्यासधारी बन कर निर्णय करने
चाहिए |
इस विषय पर
राजनैतिक प्रतिक्रियाएँ प्रतीक्षित हैं |
आईबीटीएल मत - एक
बार फिर नीतिगत निर्णयों के नाम पर राष्ट्रीय सम्पदा निजी उद्योग समूहों को बेच दी
गयी | १० लाख करोड़ से अधिक का अनुमान डरावना है | कोयला मंत्रालय प्रधान मंत्री के ही पास रहा है | मंत्रालय में राज्य मंत्री भी कांग्रेस के ही रहे हैं | सहयोगियों के सर ठीकरा फोड़ने का बचाव भी इस बार कांग्रेस
के पास नहीं है | यदि यह यूपीए सरकार के
ताबूत की आखिरी कील बन जाए तो आश्चर्य नहीं होगा |
2जी लाइसेंस देने की
प्रक्रिया की शुरुआत से लेकर अन्त तक दयानिधि मारन ने जितनी भी अनियमितताएं और
मनमानी कीं उसमें प्रधानमंत्री की पूर्ण सहमति, जानकारी और मदद शामिल है, ऐसे में प्रधानमंत्री स्वयं को बेकसूर और अनजान बताते हैं
तो यह बात गले उतरने वाली नहीं है।
हमारे अब तक के
सबसे "ईमानदार" कहे जाने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अक्सर
भ्रष्टाचार का मामला उजागर होने के बाद या तो साफ़-साफ़ अपना पल्ला झाड़कर अलग हो
जाते हैं, अथवा उनके "पालतू
भाण्ड" टाइप के अखबार और पत्रिकाएं, उन्हें
"ईमानदार" होने का तमगा तड़ातड़ बाँटने लगते हैं। प्रधानमंत्री स्वयं भी
खुद को भ्रष्टाचार के ऐसे "टुटपूंजिये" मामलों से बहुत ऊपर समझते हैं, वे अपने-आप को "अलिप्त" और "पवित्र"
बताने का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देते…। उनका
"सीजर की पत्नी" वाला चर्चित बयान तो अब एक मखौल सा लगता है, खासकर उस स्थिति में जबकि लोकतन्त्र में जिम्मेदारी
"कप्तान" की होती है। जिस प्रकार रेल दुर्घटना के लिए रेल मंत्री या कोई
वरिष्ठ अधिकारी ही अपने निकम्मेपन के लिए कोसा जाता है। उसी प्रकार जब पूरे देश
में चौतरफ़ा लूट चल रही हो, नित नये मामले सामने आ
रहे हों, ऐसे में "सीजर की
पत्नी" निर्लिप्त नहीं रह सकती न ही उसे बेगुनाह माना जा सकता है। मनमोहन
सिंह को अपनी जिम्मेदारी निभानी ही चाहिए, परन्तु ऐसा नहीं
हो रहा। यदि डॉ सुब्रह्मण्यम स्वामी और सुप्रीम कोर्ट सतत सक्रिय न रहें और
निगरानी न बनाए रखते, तो 2G वाला मामला भी बोफ़ोर्स और हसन अली जैसा हश्र पाता…
और अब तो
जैसे-जैसे नए-नए सबूत सामने आ रहे हैं,
उससे साफ़ नज़र आ
रहा है कि प्रधानमंत्री जी इतने "भोले, मासूम और
ईमानदार" भी नहीं हैं जितने वे दिखने की कोशिश करते हैं। दूरसंचार मंत्री
रहते दयानिधि मारन ने अपने कार्यकाल में जो गुलगपाड़े किये उनकी पूरी जानकारी
मनमोहन सिंह को थी, इसी प्रकार ए राजा (जो कि
शुरु से कह रहा है कि उसने जो भी किया चिदम्बरम और मनमोहन सिंह की पूर्ण जानकारी
में किया) से सम्बन्धित दस्तावेज और अफ़सरों की फ़ाइल नोटिंग दर्शाती है कि मनमोहन
सिंह न सिर्फ़ सब जानते थे, बल्कि उन्होंने अपनी तरफ़
से इसे रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाया (हालांकि मामला उजागर होने के बाद भी वे
कौन सा तीर मार रहे हैं?)। 2जी घोटाला (2G
Spectrum Scam) उजागर होने के बावजूद प्रधानमंत्री द्वारा ए. राजा की पीठ सरेआम थपथपाते इस
देश के लोगों ने टीवी पर देखा है…।
इस बात के
पर्याप्त तथ्य और सबूत हैं कि ए राजा के मामले के उलट, जहाँ कि प्रधानमंत्री और राजा के बीच पत्र व्यवहार हुए और
फ़िर भी राजा ने प्रधानमंत्री की सत्ता को अंगूठा दिखाते हुए 2G स्पेक्ट्रम मनमाने तरीके से बेच डाले… दयानिधि मारन के मामले में तो स्वयं प्रधानमंत्री ने इस
आर्थिक अनियमितता में मारन का साथ दिया,
बल्कि स्पेक्ट्रम
खरीद प्रक्रिया में मैक्सिस को लाने और उसके पक्ष में माहौल खड़ा करने के लिये
नियमों की तोड़मरोड़ की, कृत्रिम तरीके से
स्पेक्ट्रम की दरें कम रखी गईं, फ़िर मैक्सिस कम्पनी को
लाइसेंस मिल जाने तक प्रक्रिया को जानबूझकर विकृत किया गया। बिन्दु-दर-बिन्दु
देखिए ताकि आपको आसानी से समझ में आए,
देश को चूना कैसे
लगाया जाता है…
1) दयानिधि मारन ने डिशनेट कम्पनी के सात लाइसेंस
आवेदनों की प्रक्रिया रोके रखी –
दयानिधि मारन ने
डिशनेट कम्पनी द्वारा प्रस्तुत लाइसेंस आवेदनों पर ढाई साल तक कोई प्रक्रिया ही
नहीं शुरु की, कम्पनी से विभिन्न प्रकार
के प्रश्न पूछ-पूछ कर फ़ाइल अटकाये रखी,
यह बात शिवराज
समिति की रिपोर्ट में भी शामिल है। मारन ने शिवशंकरन को इतना परेशान किया कि उसने
कम्पनी में अपना हिस्सा बेच डाला।
2) मैक्सिस कम्पनी को आगे लाने हेतु विदेशी निवेश
की सीमा बढ़ाई –
मैक्सिस कम्पनी
को लाइसेंस पाने की दौड़ में आगे लाने हेतु दयानिधि मारन ने प्रत्यक्ष विदेशी निवेश
की सीमा को बढ़ा दिया, यह कार्रवाई कैबिनेट की
बैठक में 3 नवम्बर 2005 के प्रस्ताव एवं नोटिफ़िकेशन के अनुसार की गई जिसमें
प्रधानमंत्री स्वयं शामिल थे और उनकी भी इसमें सहमति थी।
3) मैक्सिस के लिये UAS लाइसेंस गाइडलाइन को बदला गया –
मारन ने मैक्सिस
कम्पनी को फ़ायदा पहुँचाने के लिये लाइसेंस शर्तों की गाइडलाइन में भी मनमाना
फ़ेरबदल कर दिया। मारन ने नई गाइडलाइन जारी करते हुए यह शर्त रखी कि 14 दिसम्बर 2005 को भी 2001 के स्पेक्ट्रम भाव मान्य किये जाएंगे (जबकि इस प्रकार
लाइसेंस की शर्तों को उसी समय बदला जा सकता है कि धारा 11(1) के तहत TRAI से पूर्व अनुमति ले ली
जाए)। दयानिधि मारन ने इन शर्तों की बदली सिर्फ़ एक सरकारी विज्ञापन देकर कर डाली।
इस बात को पूरी कैबिनेट एवं प्रधानमंत्री जानते थे।
इस कवायद का सबसे
अधिक और एकमात्र फ़ायदा मैक्सिस कम्पनी को मिला, जिसने दिसम्बर 2006 में ही 14 नवीन सर्कलों में UAS लाइसेंस प्राप्त
किये थे।
4) मैक्सिस कम्पनी ने शिवशंकरन को डिशनेट कम्पनी
से खरीद लिया था, और इस बात का उल्लेख और
सबूत सीबीआई के कई दस्तावेजों में है,
जिसे सुप्रीम
कोर्ट में पेश किया जा चुका है।
5) 11 जनवरी 2006 को जैसे ही
मैक्सिस कम्पनी ने डिशनेट को खरीद लिया,
मारन ने
प्रधानमंत्री को पत्र लिखा जिसमें मंत्रियों के समूह के गठन की मांग की गई ताकि
एयरसेल को अतिरिक्त स्पेक्ट्रम आवंटित किया जा सके। मारन को पता चल गया था कि वह
कम्पनी को लाइसेंस दे सकते हैं, लेकिन उन्हें स्पेक्ट्रम
नहीं मिलेगा। दयानिधि मारन को पक्का पता था कि स्पेक्ट्रम उस समय सेना के पास था, तकनीकी एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय का प्रभार होने के
कारण दयानिधि मारन लाइसेंस के आवेदनों को ढाई वर्ष तक लटका कर रखे रहे, लेकिन जैसे ही मैक्सिस कम्पनी ने डिशनेट को खरीद लिया तो
सिर्फ़ दो सप्ताह के अन्दर ही लाइसेंस जारी कर दिये गये। साफ़ है कि इस बारे में
प्रधानमंत्री सब कुछ जानते थे, क्योंकि सभी पत्र व्यवहार
प्रधानमंत्री को सम्बोधित करके ही लिखे गए हैं।
6) मारन ने मैक्सिस कम्पनी को “A” कैटेगरी सर्कल में चार अतिरिक्त लाइसेंस लेने हेतु
प्रोत्साहित किया। मारन ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखा उसके अगले दिन ही यानी 12 जनवरी 2006 को मैक्सिस (डिशनेट) ने “ए” कैटेगरी के सर्कलों के
लिए 4 आवेदन डाल दिये, जबकि उस समय कम्पनी के सात आवेदन पहले से ही लम्बित थे। इस
प्रकार कुल मिलाकर मैक्सिस कम्पनी के 11 लाइसेंस आवेदन हो गये।
7) 1 फ़रवरी 2006 को दयानिधि मारन
स्वयं प्रधानमंत्री से व्यक्तिगत रूप से मिले, ताकि मंत्री समूह में उनके एजेण्डे पर जल्दी चर्चा हो।
8) प्रधानमंत्री ने मंत्री समूह को चर्चा हेतु
सन्दर्भ शर्तों (Terms of Reference)
की घोषणा की तथा
उन्हें स्पेक्ट्रम की दरों पर पुनर्विचार करने की घोषणा की –
11 जनवरी 2006 के पत्र एवं 1 फ़रवरी 2006 की व्यक्तिगत मुलाकात के बाद 23 फ़रवरी 2006 को प्रधानमंत्री ने
स्पेक्ट्रम की दरों को तय करने के लिए मंत्री समूह के गठन की घोषणा की, जो कि कुल छः भाग में थी। इस ToR की शर्त 3(e) में इस बात का उल्लेख
किया गया है कि, “मंत्री समूह स्पेक्ट्रम
की दरों सम्बन्धी नीति की जाँच करे एवं एक स्पेक्ट्रम आवंटन फ़ण्ड का गठन किया जाए।
मंत्री समूह से स्पेक्ट्रम बेचने, उस फ़ण्ड के संचालन एवं इस
प्रक्रिया में लगने वाले संसाधनों की गाइडलाइन तय करने के भी निर्देश दिये। इस
प्रकार यह सभी ToR दयानिधि मारन की इच्छाओं
के विपरीत जा रही थीं, क्योंकि दयानिधि पहले ही 14 दिसम्बर 2005 को UAS लाइसेंस की गाइडलाइनों की घोषणा कर चुके थे (जो कि
गैरकानूनी थी)। मारन चाहते थे कि UAS
लाइसेंस को सन 2001 की दरों पर (यानी 22 सर्कलों के लिये
सिर्फ़ 1658 करोड़) बेच दिया जाए।
9) अपना खेल बिगड़ता देखकर मारन ने प्रधानमंत्री को
तत्काल एक पत्र लिख मारा जिसमें उनसे ToR
(Terms of References) की शर्तों के बारे मंब तथा ToR के नये ड्राफ़्ट के बारे में सवाल किये। प्रधानमंत्री और
अपने बीच हुई बैठक में तय की गई बातों और ToR की शर्तों में
अन्तर आता देखकर मारन ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर पूछा कि – “माननीय प्रधानमंत्री जी, आपने मुझे आश्वासन दिया था कि ToR की शर्तें ठीक वही रहेंगी जो हमारे बीच हुई बैठक में तय की
गई थीं, परन्तु मुझे यह देखकर
आश्चर्य हुआ है कि जो मंत्री समूह इस पर गठित किया गया है वह अन्य कई विस्तारित
शर्तों पर भी विचार करेगा। मेरे अनुसार सामान्यतः यह कार्य इसी मंत्रालय द्वारा ही
किया जाता है…”। आगे दयानिधि मारन
सीधे-सीधे प्रधानमंत्री को निर्देश देते लगते हैं, “कृपया सभी सम्बद्ध मंत्रियों एवं पक्षों को यह निर्देशित
करें कि जो ToR “हमने” तय की थीं (जो कि साथ में संलग्न हैं) उन्हीं को नए सिरे से
नवीनीकृत करें…”। दयानिधि मारन ने जो ToR तैयार की, उसमें सिर्फ़ चार भाग थे, जबकि मूल ToR में छः भाग थे, इसमें दयानिधि मारन ने नई ToR भी जोड़ दी, “डिजिटल क्षेत्रीय प्रसारण
हेतु स्पेक्ट्रम की अतिरिक्त जगह खाली रखना…”। असल में यह
शर्त और इस प्रकार का ToR बनाना दूरसंचार मंत्रालय
का कार्यक्षेत्र ही नहीं है एवं यह शर्त सीधे-सीधे कलानिधि मारन के “सन टीवी” को फ़ायदा पहुँचाने हेतु
थी। परन्तु इस ToR की मनमानी शर्तों और नई
शर्त जोड़ने पर प्रधानमंत्री ने कोई आपत्ति नहीं उठाई, जो सन टीवी को सीधे फ़ायदा पहुँचाती थी। अन्ततः सभी ToR प्रधानमंत्री की अनुमति से ही जारी की गईं, प्रधानमंत्री इस बारे में सब कुछ जानते थे कि दयानिधि मारन “क्या गुल खिलाने”
जा रहे हैं।
10) विदेशी निवेश बोर्ड (FIPB) द्वारा मैक्सिस कम्पनी की 74% भागीदारी को हरी झण्डी दी -
मार्च-अप्रैल 2006 में मैक्सिस कम्पनी में 74% सीधे विदेशी निवेश की अनुमति को FIPB द्वारा हरी झण्डी दे दी गई। इसका साफ़ मतलब यह है कि न सिर्फ़
वाणिज्य मंत्री इस 74% विदेशी निवेश के बारे
में जानते थे, बल्कि गृह मंत्रालय भी इस
बारे में जानता था, क्योंकि उनकी अनुमति के
बगैर ऐसा हो नहीं सकता था। ज़ाहिर है कि इस प्रकार की संवेदनशील और महत्वपूर्ण
जानकारी प्रधानमंत्री सहित कैबिनेट के कई मंत्रियों को पता चल गई थी। प्रधानमंत्री
कार्यालय द्वारा इस तथ्य की कभी भी पड़ताल अथवा सवाल करने की कोशिश नहीं की गई कि मैक्सिस
कम्पनी 99% विदेशी निवेश की कम्पनी
थी, 74% विदेशी निवेश तो सिर्फ़ एक धोखा था क्योंकि बचे
हुए 26% निवेश में सिर्फ़ “नाम के लिए” अपोलो कम्पनी के रेड्डी
का नाम था। यह जानकारी समूची प्रशासनिक मशीनरी, मंत्रालय एवं सुरक्षा सम्बन्धी हलकों को थी, परन्तु प्रधानमंत्री ने इस गम्भीर खामी की ओर उंगली तक नहीं
उठाई, क्यों?
11) अप्रैल से नवम्बर 2006 तक कोई कदम नहीं उठाया –
दयानिधि मारन
चाहते तो 14 दिसम्बर 2005 की UAS लाइसेंस गाइडलाइन के आधार
पर आसानी से मैक्सिस कम्पनी के सभी 14 लाइसेंस आवेदनों को
मंजूरी दे सकते थे, परन्तु उन्होंने ऐसा
जानबूझकर नहीं किया, क्योंकि ToR की शर्तों में “स्पेक्ट्रम की दरों का
पुनरीक्षण होगा” भी शामिल थी। FIPB की विदेशी निवेश मंजूरी के बाद भी दयानिधि मारन ने लाइसेंस
आवेदनों को रोक कर रखा। साफ़ बात है कि इन 8 महीनों में
प्रधानमंत्री कार्यालय पर जमकर दबाव बनाया गया जो कि हमें नवम्बर 2006 के बाद हुई तमाम घटनाओं में साफ़ नज़र आता है।
12) दयानिधि मारन ने ToR की शर्तों का नया ड्राफ़्ट पेश किया –
16 नवम्बर 2006 को दयानिधि मारन ने अवसर का लाभ उठाते हुए मंत्री समूह के
समक्ष एक नया ToR शर्तों का ड्राफ़्ट पेश
किया, जिसमें स्पेक्ट्रम की कीमतों के पुनरीक्षण वाली
शर्त हटाकर क्षेत्रीय डिजिटल प्रसारण वाली शर्त जोड़ दी। इस प्रकार यह ToR वापस पुनः उसी स्थिति में पहुँच गई जहाँ वह 28 फ़रवरी 2006 को थी। ज़ाहिर है कि ToR की इन नई शर्तों और नये ड्राफ़्ट की जानकारी प्रधानमंत्री को
थी, क्योंकि ToR की यह शर्तें
प्रधानमंत्री की अनुमति के बिना बदली ही नहीं जा सकती थीं।
13) इस बीच दयानिधि मारन ने
अचानक जल्दबाजी दिखाते हुए 21 नवम्बर 2006 को मैक्सिस कम्पनी के लिये सात Letter of Intent (LoI) जारी कर दिये, क्योंकि मारन को पता था कि ToR की नई शर्तें जो कि 16 नवम्बर 2006 को नये ड्राफ़्ट में प्रधानमंत्री और मंत्री समूह को पेश की
गई हैं, वह मंजूर हो ही जाएंगी।
मैक्सिस कम्पनी के बारे में यह सूचना प्रेस और आम जनता को हो गई थी, परन्तु प्रधानमंत्री ने कुछ नहीं किया।
14) दयानिधि मारन ने 29 नवम्बर 2006 को (यानी ठीक आठ दिन बाद
ही) मैक्सिस कम्पनी को बचे हुए सात लाइसेंस आवेदनों पर LoI जारी कर दिया।
15) 5 दिसम्बर 2006 को मारन ने मैक्सिस को सन 2001 के भाव में सात लाइसेंस भी जारी कर दिये, क्योंकि मारन अच्छी तरह जानते थे कि मंत्री समूह अब ToR की नई शर्तों पर विचार अथवा स्पेक्ट्रम की दरों का
पुनरीक्षण करने वाला नहीं है। मारन को स्वयं के बनाये हुए फ़रवरी और नवम्बर 2006 में पेश किये गये दोनों ड्राफ़्टों को ही मंजूरी मिलने का
पूरा विश्वास पहले से ही था, और ऐसा प्रधानमंत्री के
ठोस आश्वासन के बिना नहीं हो सकता था।
आदित्य शर्मा
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